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Vaidya Uddhavdas Mehta



भोपाल के कुलीन और प्रतिषठित ब्राहाण परिवार मे जन्म लेकर स्वर्गीय श्री उद्धवदास मेहता ने अपने जीवन की प्रत्येक सांस हिंदी, हिन्दु और हिंदुस्तान के हित में होम दी । उनकी संघर्ष पूर्ण जीवन गाथा भोपाल रियासत के नवाबी दौर में आतंक और शोषण की शिकार हिंदू जनता को सम्बल देती रही । सम्मान और क्रतज्ञता भाव से जनता ने उन्हे भाई जी के नाम से संबोधित किया और भाई जी ने समान रूप से सभी को स्नेह एंव सहारा दिया । काशी संस्कृत कालेज से आयुर्वेद एंव संस्कृत की परिक्षाये उत्तीर्ण करने के पक्ष्चात भाई जी ने आजीविका के लिये चिकित्सक का व्यवसाय अपनाया परंतु उनकी प्राथमिक्ता समाज सेवा ही रही । महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय को अपना आदर्श मानने वाले भाई जी ने नवाबी शासन में हिंदुओं पर होने वाले ज़ुल्मो के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद कर दिया । १९२८ से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करते हुए १९३० में हिंदु कांफ्रेंस के नाम से नवाब भोपाल को २८ सूत्रीय ज्ञापन सोंपा ।



सन्‌ १९३४ में भोपाल से प्रथम हिंदी साप्ताहिक 'प्रजा पुकार' का प्रकाशन प्रारम्भ किया । सन्‌ १९३७ में नागरिक स्वतंत्रता के पह्ले आंदोलन में भाई जी को गिरफ्तार कर लियाा और 6 माह की सजा सुनाई गई संकल्प और भी द्रढ़ हुआ । जेल से छूटे तो आर्य समाज के हैदराबाद सत्याग्रेह में जूट गए । १९४० में भोपाल में राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ का कार्य प्रारम्भ हुआ और भाई जी को संघचाचालक बनाया गया ।

सन्‌ १९४४ में संघ की रैली में दिये गए भाषण को नवाबी शासन ने आपत्तिजनक मानते हुए पुन: गिरफ्तार कर लिया । सन्‌ १९४९ में विलीनीकरण आंदोलन किये गये । भाई जी की गिरफ्तारी के विरोध में जंगी प्रदर्शन हुए । प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने निर्मम लाठी चार्ज किया । भोपाल में डायरेक़्ट एक्शन के नाम पर जब हिंदु मंदिरो की तोड फोड की गई तो भाई जी ने सात दिन तक अनशन किया । परिणाम स्वरूप नवाबी शासन को लूट की क्षति पूर्ति करनी पड़ी और मंदिरों में मूर्तियो की प्राण प्रतिषठा करानी पड़ी । राजनीति भाई जी के मूल स्वभाव में नहीं थी ।



परंतु भोपाल राज्य की तत्कालीन परिस्थितियों की चुनौती स्वीकार करते हुए भाई जी ने हिंदु महासभा का नेत्रित्व सम्भाला और हिंदु हितों के संरक्षण का माध्यम बनाया । बाद में श्री कुशाभाउ ठाकरे तथा पण्डित दींनदयाल उपाध्याय के आग्रह पर वह जनसंध में शामिल हुए । लेकिन राजनीतिक द्ल के नेता होने के बावजूद भाई जी समाज सेवा के कार्यो में सक्रिय रहे । भोपाल में विश्राम घाट ट्रस्ट बाल निकेतन, मंदिर कमाली ट्रस्ट की सीपना कराई । हिंदु त्योंहारो को उल्लासपूर्वक आयोजित करने की परम्परा डाली ।



हिंदु समाज को जातिगत भेदभाव से मुक्त करने का प्रयास चलाया और अपह्रत महिलाओं को मुक्ती दिलाकर उन्हे समाज में सम्मांपूर्ण स्थान दिलाया, भाई जी एक अच्छे चिकित्सक थे । गरीबों को नि:शुल्क दवाये देकर उन्होने पूरे समाज का सम्मान जीता । अपने पेशे, समाज सेवा और राजनीति के बीच अदभुत समंवय स्थापित करने के कारण उनके राज्नीतिक विरोधी भी भाई जी को श्रद्धा दॄष्टि से देखते रहे । बंगाल के अकाल के समय पीडितो के लिए सहायता साम्ग्री जुटाने, १९६२ में चीनी आक्रमण के विरूद्द सर्वदलीय चीनी आक्रमण विरोधी समिति का गठन, १९७१ में मूल्य वृद्धि आंदोलन का नेत्रित्व, पीरगेट पर दुर्गा मंदिर की स्थापना के लिये संघर्ष तथा आपातकाल में जनता का मनोबल बढाने के लिये की गई जेल यात्रा भाई जी के जीवन के ऐसे कीर्तिमान हैं । जिन्हें भोपाल की जनता कभी विस्मृत नहीं कर सकती । यही कारण है कि आज भी उनके नाम का पूण्य स्मरण पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है ।